saai baba anmol vichar - साईं बाबा अनमोल विचार

 साई बाबा 


अट्ठारहवीं शताब्दी के  उत्तरार्ध में भारतीयों पर अंग्रेजो  के अत्याचारों की अति  हुई थी , जिसे समस्त भारतवर्ष त्राहि - त्राहि कर रहा था।  अपने क्षुद्र स्वार्थ  खातिर अंग्रेजो ने भारतीओं को हिन्दू मसलमान में बाँट रखा था।  पुरे भारत में अराजकता का माहौल था।  अंग्रेजो की नीतियों ने सारे देशवासियों को बांट रखा था और स्वयं उनकी आपसी फुट का फायदा उठाकर राज कर रही थी।  तब एक महापुरुष ने जन्म लिया और मानव कल्याण के लिए अपना संपूर्ण जीवन होम कर दिया।  फ़क़ीर के रूप में रहते हुए उन्होंने मनुष्य को हिन्दू - मुसलमान से पहले एक - दूसरे का भाई होने का उपदेश दिया और जहां आम व्यक्ति की सामर्थ्य खत्म होती है , उससे कहीं आगे जाकर दिन - दुखीयों का दुःख - दर्द दूर किया।  श्री साईं बाबा के माता - पिता , उनके जन्म और बचपन संबंधी कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।  उन्हें सर्वप्रथम महाराष्ट्र के एक गाँव के मुखिया चांद पाटिल द्वारा जंगल में देखा गया।  चांद पाटिल वहां उनके चमत्कार देखकर हैरान रह गया।  गाँव वापिस आकर उसने गावं वालों को अपनी आपबीती सुनाई तो गावं वाले बाबा से मिलने के लिए उतावले हो उठे।  कुछ दिन बाद बाबा उनके गावं आए और फिर उनके  साथ शिरडी गए।  इसके बाद वे स्थाई रूप से शिरडी में ही बस गए।  शिरडी में स्थित एक मस्जिद को  निवास बनाया और  वहीं से दिन - दुखियों  के दर्द को दूर करने का प्रयास किया।  उन्होंने सबको शांति और मानवता का सन्देश दिया।  शिरडी के साईं बाबा का प्रताप ऐसा था की उनके होथों से तेल की जगह पानी भरे दीप भी जल  उठते थे।  शिरडी में रहने के कारण साईं बाबा को शिरडी वाले साईं बाबा के नाम से जाना गया।  उन्हें हिन्दू - मुसलमान दोनों ही धर्मो के लोग पूरी श्रध्दा के साथ मानते थे।  दूर - दूर से लोग अपनी मुसीबतों को लेकर साईं बाबा के पास आते थे।  वे उनकी मुसीबतों को क्षण - भर में दूर कर देते थे।  गरीबो और बेसहारों का दुःख उनसे देखा नहीं जाता था।  उन्होंने अपने उपदेशो में मानव को आपसी भाई चारे में रहने  का सन्देश दिया है।  वे सभी धर्मो को परमपिता परमेश्वर तक पहुंचने का मार्ग मानते थे।  शिरडी के साईं बाबा के प्रति श्रध्दालुओं की श्रध्दा और विश्वास अटूट था। साईं बाबा ने भी दिन दुखियों का दुःख - दर्द दूर करने में अपना समस्त जीवन अर्पित कर दिया।  सबको सुमार्ग दिखाने वाले और ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले ऐसे दिव्य पुरुष को हमारा शत - शत प्रणाम।     

1- शांति और सुख बाह्म वस्तुएं नहीं हैं।  वे तुम्हारे अंदर ही निवास करती।  सिर्फ उन्हें पहचानने की बात है।  

2- सांसारिक चीजों से मुक्ति की तीव्र इच्छा होनी चाहिए।  

3- परमात्मा की कृपा का होना भी अनिवार्य है।  वेद , शास्त्र अथवा कोई अन्य ग्रन्थ पढ़ने और उनका गहरा ज्ञान प्राप्त करने मात्र से आत्म - ज्ञान संभव नहीं।  

4- सेवा करने वाले हाथ स्तुति करने वाले हाथों से अधिक पवित्र है। 

5- धर्म से अर्थ उतपन्न होता है।  धर्म से सुख होता है।  धर्म से मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है।  धर्म जगत का सार है।  

6- हानि - लाभ , जीवन - मरण।, जस - अपजस , विधि - हाथ।  जो जीवन भगवान का प्रसाद मानकर इस भाव से जीता है , वही आत्म - निवेदन भक्ति का साकार रूप है।  

7- लोक तथा परलोक संबंधी कीसी भी चीज के प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए। 

8- हमारी इद्रियों को बाहरी चीजों से रमण करने की आदत पड चुकी है।  हमें इनकी बाहर भागने की प्रवित्ति पूरी तरह रोकनी होगी और इन्हे अपने अंदर स्थित आत्मा से जोड़ना होगा।  

9- जब तक व्यक्ति अपने मन को विकारों और बुराइयों में प्रवेश करने से रोकने की शक्ति  प्राप्त नहीं कर लेता , वह ज्ञान भले ही प्राप्त कर ले , पर आत्म ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।  

10- आध्यात्मिक मार्ग - दर्शन के लिए गुरु की आवश्यकता होती है और गुरु उसी व्यक्ति को बनाना चहिए जिसने आत्म - ज्ञान प्राप्त कर लिया हो , अन्यथा सब करे - धरे पर पानी फिर जायेगा।  

11- संसार के सभी आनंद क्षणिक और अस्थयी हैं , जबकि आध्यात्मिक आनंद कल्याणकारी है।  अतः संसार के सुखो से अपने आपको पूरी तरह हटाकर आध्यात्मिक आनंद में रमण करना चाहिए।  

12- मन और इन्द्रियों को सांसारिक सुखो से विरक्त किए बिना आध्यात्मिक ज्ञान में प्रवेश संभव नहीं है।  

13- आत्म - साक्षात्कार के लिए यह आवश्यक है की व्यक्ति केवल सत्य का आचरण करे और ब्रह्मचर्य का पालन करे।  

14- गुरु में पूर्ण विश्वास करो यही साधना है , गुरु में सभी देवता निवास करते हैं।  

15- संसार में रहो पर संसार को अपने अंदर मत रहने दो।  यही विवेक का लक्षण है।  

16- सारी वासनाओ को त्याग देना चाहिए , इच्छारहित बन जाना चाहिए , हृदय में समभाव स्थपित होना चाहिए , फिर आदमी मुमुक्षु बन जाता तो मुक्ति मिल जाती है।  

17- आदमी अपनी इच्छा पर काबू पाकर मन को प्रभु पर एकाग्र करता है तो मन की समाधि अवस्था प्रकट होती है और प्रभु मिल जाते हैं।  

18- ज्ञान की सर्वोच्च प्राप्ति का अर्थ है , एक आत्मा के माध्यम से सारी सृष्टि को समझ लेना।  ज्ञान में दो बातो की आवश्यकता होती है , एक तो मानसिक शक्ति और एक लक्ष्य पर पूर्ण एकाग्र होना चाहिए।  

19- चरित्र शक्ति है।  ज्ञान व्यक्ति के चरित्र को और अच्छा बनाता है।  

20- काम - वासना , मानव की महानतम शत्रु है और इसपर काबू नहीं पाया तो क्रोध विकराल रूप धारण कर लेता है और बाकी अन्य सभी साथियों लोभ , मोह , मद , मत्सर को बुलाकर आपके जीवन को नष्ट कर देता है और आध्यात्मिकता की और बढ़ने वाले सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।  

21- वास्तव में तीन चीजें  पाना अत्यंत विकत है और वे केवल प्रभु की कृपा से ही संभव हैं - मानव जन्म , मोक्ष की तीव्र इच्छा और ख्यात नाम , सच्चे संत के साथ सत्यसंग। 

22- मानव ह्रदय में घृणा , लोभ और द्वेष ऐसी विषैली घास है जो प्रेमरूपी पौधे को नष्ट कर देती है।  

23- अगर कोई मेरा नाम लेकर ध्यान करता है , नाम जप करता है , मेरी लीलाओं को पढ़ता है , गुनगुनाता है और मुझमे रम जाता है तो में उसके बुरे कर्मो का नाश करता हूँ और सदैव उसके साथ रहता हूं।  


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