Hanuman bhashya part 3 by (Acharya kashyap)
अंजनिपुत्र रामदूत
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनिपुत्र पवनसुत नामा।।
हे पवनसूत , अंजनीनन्दन !श्रीराम दूत ! इस संसार में आपके सामान दूसरा बलवान कोई नहीं है।
दूत किसे कहते हैं ? दूत उसे कहते हैं जो किसी संगठन , संस्था या देश का प्रतिनिधित्व करता है , जैसे राजदूत अर्थात फलाना राजा का दूत। अभी राजा तो नहीं हैं पर राजदूत की पदवी है। एक देश के दूत जब दूसरे देश में जाते हैं तो वहां के राजदूत कहलाते हैं। राज दूत को कूटनिति , राजनीति , धर्मनीति , अर्थनीति सबका प्रशिक्षण दिया जाता है। जिस राजदूत के चलते किसी देश से हमारा संबंध खराब हो जाता है। उस राजदूत को दण्डित किया जाता है। बहुत बड़ी जिम्मेवारी है यह। राजदूत की बड़ी कीमत है। राजदूत बहुत सोच समझकर बनाया जाता है , जो अपने देश का दूसरे देशो से संबंध सुधार सके। हनुमानजी भी भगवान रामके दूत हैं। भगवान राम उनके गुरु भी हैं , वे जहाँ -जहाँ इनको भेजते हैं वे वहां -वहां उनका काम बनाते हैं। जब काम बनाते हैं तो राम का रामत्व उनमें उतर आता है , वे अतुलित बलशाली हो जाते हैं। आप भी जब अपने गुरु - गोविन्द के दूत बनकर उनके द्वारा प्रदत्त कार्य में लग जाओगे तो ,अतुलित बलधामा, अर्थात अतुलित बलशाली हो जाओगे। गुरु का गुरुत्व आपमें उतर आएगा। जिससे बल इतना आ जाएगा , शक्ति और पुरुषार्थ इतना आ जाएंगे की आपको स्वंम भी इसका पता नहीं चलेगा। लेकिन अभी आप केवल पाठ कर लेते हो। इसे अपने में उतारो की आपको जो भी कार्य दिया जाए , सौंपा जाए उसमें सफलता प्राप्त करो। , गलती हो गई , कहने से काम नहीं चेलेगा। हनुमानजी की तरह आप भी अपने गुरु के काम में दूत बनकर निकल जाओ और गुरुकार्य बिना विश्राम नहीं लो।
हनुमान तेहि परसा , कर पुनि कीन्ह प्रणाम।
राम काजू कीन्हे बीने , मोहि कहाँ विश्राम।।
वृद्ध अक्सर आश्रम में सेवा नहीं कर पाते। सेवा बताने पर कहते हैं यदि काम ही करना होता तो घर में ही रहते यानी उनकी पूरी चेतना घर में ही रहती है , आश्रम के प्रति नही हो पाती है। सामाजिक सेवा वह नहीं कर सकते। लड़का- लड़की की सेवा तक ही सिमित हैं। इसीलिए राम को युवा दिखाया गया है , हनुमान को युवा दिखाया गया है , हमारी तरह दाढ़ी बाल पका हुआ नहीं दिखाया गया। युवक ही सेवा , साधना , भक्ति कर सकते हैं। वृद्ध तो अपने को ढोते हैं। राम ,कृष्ण , बुद्ध ,महावीर सभी देवी- देवताओ को किशोर या युवा अवस्था में ही दिखाया गया है। किवं ऋषि -मुनि जो बचपन से ही बहुत प्रतिभाशाली है उन्हें. ही सफ़ेद दाढ़ी में दिखाया गया है। किशोरावस्था में ही कुछ कर सकते हैं। वृदावस्था में तो तर्क आ जाएगा। हम कहेंगे - गाय खिलाना जानते हैं , तो कहेंगे कभी देखे ही नहीं हैं , कैसी होती है ? अब क्या किया जाए : केवल बात करने से , पाठ करने से काम नहीं चलेगा। अपना परीक्षण करो की काम किसका कर रहे हो। राम का काम कर रहे हो या नही कर रहे हो। लेकिन हर काम को हम पेशा बना लेते हैं , व्यसाय बना लेते हैं। व्यवसाय बनाने से हम फेल हो जाते हैं। जिसका तुम पाठ कर रहे हो उसका अर्थ भी समझकर ठीक -ठीक पाठ करो तब तो फलदायक है। यदि तुम समझ रहे हो तो कोई फलदायक नहीं है।
अंजनीपुत्र पवनसुत नामा।।
अब कह रहे हैं की हनुमान माता अंजनी के पुत्र हैं। पवनसुत हैं। बहुत लोग हमसे प्रश्न करते हैं गुरूजी तीन-तीन बाप गिना दिया गया है। माँ तो एक है अंजनी। पिता पवन आ गए , फिर केसरी नंदन ,शंकर सुवन आया है न। यह शंकर के रुद्रावतार हैं। हमने बताये की जितना तुम यहां हो प्रत्यक्ष , उससे कई गुना तुम परोक्ष में हो। सूक्ष्म जगत से तुम नियंत्रित हो रहे हो। कथावाचक अक्सर कहते हैं , शंकर जी का तेज पवन के माध्यम से अंजनी तक आता है और ये केसरी व् अंजनी के पुत्र रूप मे जन्मे हैं इसीलिए तीनों का नाम गिनाया गया है। सच पूछो तो सारा कुछ तो इस पवन के मध्यम्स से ही आता है। यहाँ पर जो फूल खिला है , उस फूल की सुगंध , पवन के माध्यम से ही तो तुम्हारे पास आएगी। पवन के माध्यम से ही तुम सृष्टि के एक कोने से दूसरे कोने तक जहां कहीं भी हो सब एक दूसरे से जुड़ें हुए हो . पवन ने तुमको जोड़ दिया है। पवन को निकाल दो , वेक्यूम उत्पन्न कर दो तो आदमी जिन्दा रहेगा ? तुम कहते हो हम अलग हैं। अलग नहीं हो। पवन के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े हुए हो। सब एक दूसरे को स्पर्श कर रहे हो, अलग कहां हो। जब कोई बहुत तेज तर्रार प्रखर बच्चा होता है तो उसे सब अपना मानस पुत्र-पुत्री मान लेते हैं लेकिन कोई गधा हो जाता है अपने ही पुत्र को पुत्र कहने से नकर जाते हैं की नहीं मैं नहीं जानता हूं। इसी तरह से नारद को भी ब्रम्हा ने अपना मानसपुत्र कह दिया था , श्री राम जय राम जय जय राम , मंत्र देने वाला भी पिता होता है। और केसरी के लड़के थे ही। इसीलिए इन्हे ये तीन नाम दिया गया। इसे सम्यक द्रिष्टी से समझो। अपनी द्रिष्टी ज़रा सम्यक करो।
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